Sunday, October 10, 2010

प्राण की रागिनी फिर मुखर हो उठे

यूँ जगा दो हृदय के स्वरों को प्रिये
प्राण की रागिनी फिर मुखर हो उठे

गीत के नव स्वरों को नया साज दो
प्रेम के छंद को एक अंदाज़ दो 
दो हमें भाव की व्यंजना तुम वही
नेह की मुरलिका फिर सस्वर हो उठे

जल उठे फिर प्रणय-दीप की वर्तिका
मेल हो छंद रस-भाव संगीत का 
खोल दो प्रेरणा के नए द्वार तुम
साधना का पुनः स्वर प्रखर हो उठे

रस-भरी हो प्रणय कुञ्ज की गायिका
मन, हृदय, प्राण निर्झर बनें भाव का     
राग-सर में विचरने लगे भावना
उल्लासित प्रेम की हर लहर हो उठे

यूँ जगा दो हृदय के स्वरों को प्रिये
प्राण की रागिनी फिर मुखर हो उठे

32 comments:

  1. Lovely poem n wonderful vocabulary.. m really impressed.. waise bhi i too m a Banasthalite so i m fan of ol da Banasthalites... nice to c ur blog... keep writing.. :)

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  2. bahut achhi rachna.........
    vatvriksh se judna chahen to apni rachna mujhe mail karen rasprabha@gmail.com per parichay aur tasweer ke saath

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  3. खोल दो प्रेरणा के नए द्वार तुम
    साधना का पुनः स्वर प्रखर हो उठे

    ati sunder...........

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  4. प्रियंका जी, बहुत खूबसूरत कविता लिखी है आपने

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  5. अर्थ में लय है. शब्दों में संगीत . अच्छी लगी कविता.

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  6. "दो हमें भाव की व्यंजना तुम वही
    नेह की मुरलिका फिर सस्वर हो उठे....."

    बहुत ही खुबसूरत गीत है.....इसे आपको संगीतबद्ध करना चाहिए.....
    इस रचना के लिए बधाई .

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  7. यूँ जगा दो हृदय के स्वरों को प्रिये
    प्राण की रागिनी फिर मुखर हो उठे
    बहुत ही मधुर प्रस्तुती....
    regards

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  8. यूँ जगा दो हृदय के स्वरों को प्रिये
    प्राण की रागिनी फिर मुखर हो उठे
    प्रेम की रागिनी भी मुखर होगी.... अभी तो बस आपकी प्रस्तुति ही मुखर हो उठी है

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  9. गीत के नव स्वरों को नया साज दो
    प्रेम के छंद को एक अंदाज़ दो
    दो हमें भाव की व्यंजना तुम वही
    नेह की मुरलिका फिर सस्वर हो उठे

    गीत को
    उस की गति प्रदान करती हुई
    मनोरम पंक्तियाँ ...
    अच्छा है .

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  10. खोल दो प्रेरणा के नए द्वार तुम
    साधना का पुनः स्वर प्रखर हो उठे

    Bahut Khoob Panktiyaa hai

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  11. पढ़ी-लिखी कविता!
    आशीष
    --
    प्रायश्चित

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  12. खोल दो प्रेरणा के नए द्वार तुम
    साधना का पुनः स्वर प्रखर हो उठे

    बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द लिये अनुपम प्रस्‍तुति ।

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  13. मनोहारी गीत - उच्च स्तरीय प्रस्तुति

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  14. भाव प्रवण एवं सुन्दर शब्दों से सजी कविता , आभार

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  15. प्रियंका जी ,
    अपकी रचना में गेयत्व का जो प्रभाव है वह संगीत के प्रति आपके समर्पण का प्रमाण है । रचना में ‘रागिनी’ बहुत मुखर है। निस्संदेह आपकी ‘साधना का स्वर प्रखर’ है ,
    हां ,
    राग-सर में विचरने लगी भावना
    उल्लासित प्रेम की हर लहर हो उठी

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  16. प्रियंका जी ,
    आपकी पूरी रचना ही लयात्मक है। यह पद बेहद पसंद आया..

    रस-भरी हो प्रणय कुञ्ज की गायिका
    मन, हृदय, प्राण निर्झर बनें भाव का
    राग-सर में विचरने लगे भावना
    उल्लासित प्रेम की हर लहर हो उठे

    यूँ जगा दो हृदय के स्वरों को प्रिये
    प्राण की रागिनी फिर मुखर हो उठे


    हमारी ओर से ये पुष्प स्वीकार करें ..

    देह-प्रांगण में स्वप्नों की है अल्पना
    पल प्रणय के लिए घूमती कल्पना
    अंग प्रत्यंग में नृत्य-रत धड़कनें ,
    श्वांस प्रश्वांस उनके अधर हो उठे

    यूं घुले हैं हृदय के स्वरों में पिया!
    प्राण के सारे सुर ही मुखर हो उठे।

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  17. जग उठे फिर प्रणय-दीप की वर्तिका
    मेल हो छंद रस-भाव संगीत का
    खोल दो प्रेरणा के नए द्वार तुम
    साधना का पुनः स्वर प्रखर हो उठे


    बहुत ही मधुर ... आनंद आ गया पढ़ कर ... शब्द संयोजन बेजोड़ है .... भाव लाजवाब ....

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  18. bahut sunder bhaav sanjoye hain.... aapne.. bahut khoob

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  19. यूँ जगा दो हृदय के स्वरों को प्रिये
    प्राण की रागिनी फिर मुखर हो उठे

    vaah bahut hee badiyaa likha hai ..bahut achhe bhavon ke saath shabdon kaa sanyojan bahut sundar..

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  20. जग उठे फिर प्रणय-दीप की वर्तिका
    मेल हो छंद रस-भाव संगीत का
    खोल दो प्रेरणा के नए द्वार तुम
    साधना का पुनः स्वर प्रखर हो उठे...
    बहुत अच्छा सृजन...शुभकामनाएं

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  21. खोल दो प्रेरणा के नए द्वार तुम
    साधना का पुनः स्वर प्रखर हो उठे
    सुन्दर, विनीत भाव , अच्छी अभिव्यक्ति। बधाई।

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  22. रचना सुन्दर है ... प्रभावशाली ब्लॉग है ... अभी तो शुरुआत है ... कामना करता हूँ ऐसे ही सुन्दर शब्दों से सजाते रहिये ... आपको अनेक सफलता प्राप्त हो ...

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  23. मैं आपके ब्लॉग पर आने से पूर्व सोचता रहा था कि क्या मुझे जैसा पढना होता है, वो मिलेगा? अमूमन बहुत कम हो पाया है ऐसा, इसलिये दिमाग इस फितुर से बन्धा रहता है। खैर..और क्लिक कर ही दिया। फिर पढा..पढा और पढता चला गया..। इस प्रकार की हिन्दी में रचनायें आज के दौर में मुझे ज्यादा पढने को नहीं मिलती और जब मिलती है तो मैं ऐसे ब्लॉग को छोडता नहीं हूं। शब्द जब गाते हुए से लगे तो रचनायें अक्सर हृदय तक पहुंचती है। और यह भी सम्भव है इसलिये कि आप संगीत से जुडी हैं। (प्रोफाइल में आपने दर्शाया है) समयानुसार मैं अब आता रहूंगा..

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  24. प्रियंका जी ,
    छंदबद्ध बहुत सुंदर कविता है .....
    इस तरह की कवितायेँ अब बहुत कम लिखी जा रही है ....
    शायद आपके लेखन से फिर वो दौर शुरू हो जाये .....
    बस वो सैली अपना लीजिये जो आपको सहज लगती है ...
    या जिसमें आप बेहतर लिख सकते हो .....
    बधाई ...!!

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  25. नवलेखन में छंदबद्ध कविता कम पढ़ने कम पढ़ने को मिलती है।
    ..सुंदर कविता के लिए बधाई।

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  26. जग उठे फिर प्रणय-दीप की वर्तिका
    मेल हो छंद रस-भाव संगीत का
    खोल दो प्रेरणा के नए द्वार तुम
    साधना का पुनः स्वर प्रखर हो उठे

    अति सुंदर!
    भावों को शब्दों की माला में बड़ी सुंदरता से गूंथा गया है

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  27. sabdo ko bakhubi se aapne piroya hai, ati sundar...:)
    hame to aapse hi seekhna hoga..:)

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  28. सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ शानदार रचना लिखा है आपने! बधाई!

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